इस साउंड क्लिप को Play करके ये ब्लॉग पढ़ना, शायद अच्छा लगे आपको 😊

जब से मैं अपने 30s के दौर में कदम रखा है,
ऐसा लगता है जैसे ज़िम्मेदारियाँ अचानक कई गुना बढ़ गई हों।

परिवार को संभालने से लेकर,
परिवार को आगे बढ़ाने तक
हर मोर्चे पर कुछ न कुछ करते रहना है।

ऑफिस का काम भी समय पर पूरा करना है,
कंपनी, बॉस और टीम, सबका हित भी सोचना है।

बिल, EMI, रेंट, SIP, इन्वेस्टमेंट तोह
जैसे हर वक्त दिमाग़ के बैकग्राउंड में चलते रहते हैं।

समाज के नियम-कायदे और इज़्ज़त बनाए रखनी है,
और आसपास हो रही हर चीज़ पर
अपनी राय रखने की भी एक उम्मीद सी रहती है।

अच्छे कपड़े, अच्छी सेहत, अच्छा खान-पान
सब कुछ मेंटेन करने की लगातार कोशिश।

छोटा हो या बड़ा,
सबकी बात सुनना, समझना, मानना।
हर चीज़ ठीक रखने की चिंता,
जैसे गलती की कोई गुंजाइश ही नहीं।

मेरे 30s वाले करीबी दोस्त या परिवार के लोग
शायद ज़ोर से कुछ कहते नहीं,
पर “सब कुछ सही करने” का जो प्रेशर है,
वो भी जरूर महसूस करते होंगे।

पर मैं भी ना…
थोड़ा ज़्यादा ही आशावादी इंसान हूँ।

सीख रहा हूँ कि इस जीवन में
सुख और दुःख, दोनों के अनुभवों के साथ जीना पड़ेगा।
जान रहा हूँ खुद को संभालना,
और वक्त के साथ थोड़ा सरेंडर करना
जो हो रहा है, उसे होने देना।

मोह-माया की इस दुनिया से
उतनी ही मोहब्बत कर रहा हूँ, जितनी मेरी क्षमता है।

शायद किसी रेस में ही हूँ,
पर इतना यकीन है कि उसमें फर्स्ट आने की कोई ज़िद नहीं है।

Leave a comment