कॉलेज प्लेसमेंट हुआ था अपना पुणे की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में। सैलरी फिगर इतना बड़ा तोह नहीं था पर उस काम और मेरे जैसे इंसान के हिसाब से पर्यापत था। अपन खुश थे। जब कनवोकेशन सेरेमनी के लिए कॉलेज वापस आये तब बढ़िया सेलिब्रेट किया दोस्तों और जूनियर्स के साथ। बेहतरीन माहौल था। 🥳

उन्ही माहौल के दिनों में एक अज़ीज़ मित्र ने कुछ जर्रूरी बात करने के लिए अलग से बैठ कर बात करने को बुलाया। मित्र बोला,”भाई पैसे उधार चाहिए। अमाउंट थोड़ा बड़ा है, क्या तू मदद कर देगा?” मैंने अमाउंट और कारण पूछा। 60 हज़ार और दिल्ली में कोचिंग करने के लिए। मैंने हाँ कर दी और 4 महीने के सैलरी से जो सेविंग्स बनी उसको दे दी।अच्छा दोस्त है तोह ब्याज और पैसा कब मिलेगा इस पर चर्चा नहीं हुई। 🙂

दिसंबर 2015 के अंत में, मैं नौकरी छोड़ कर दिल्ली आ गया आईएएस की पढाई के लिए। कुछ महीनो की सेविंग्स से कुछ महीने तोह निकल गए दिल्ली में, बाकी घरवालों का सपोर्ट था ही। फिर जब सेविंग्स ख़तम होने लगी तोह अपने मित्र से पूछा की भाई पैसा कब तक दे सकेगा। उसने अपनी मज़बूरी बता दी की वो फिलहाल नहीं दे पायेगा। वो वादा करने लगा की धीरे-धीरे पैसे जोड़ कर जल्द ही पूरे पैसे दे देगा। मैंने उसको मना कर दिया की वादा नहीं चाहिए, पैसे लेने की जल्दी नहीं है मुझे। एग्जाम क्लियर करने का प्रेशर हैंडल कर ले तू ,पैसा लौटाने का प्रेशर मत ले फिलहाल। 😅

उसका एग्जाम क्लियर नहीं हुआ। 3 साल प्रयत्न करने पर भी बात नहीं बनी। मुझे उसका रिजल्ट और स्थिति पता थी इसलिए पैसे मांगना सही नहीं लगा। भगवान् की कृपा से ऐसी नौबत भी नहीं आयी मेरे पर की उस पर दबाव डालकर पैसे वापस ले लिए जाए। हम दोनों के जीवन में असफलताएं और संघर्ष चल रहे थे तोह बातचीत भी बंद-सी हो गयी थी। 😬

अभी न्यू ईयर के टाइम पर उसका फ़ोन आया। बहुत अच्छा लगा उससे बात करके। हालचाल और स्वस्थ दोनों सही है उसके।फिर वो धीमे और गंभीर स्वर में माफ़ी मांगने लग गया,”सॉरी भाई, पैसा ना लौटाने और बातचीत बंद करने पर।” मैंने उसकी बात काटते हुए कहा,”कोई बात नहीं भाई, मुझे तेरी परिस्थिति पता थी। इसलिए समझता हूँ , तू बुरा फील मत कर।” वो बोला,” भाई, तू इतना बड़ा दिल कैसे रख सकता है? इतने सालों में तुझे ऐसा नहीं लगा की तेरे पैसे डूब गए या दोस्ती के नाम पर मैंने तुझे ठग लिया? मैंने कहा,”भाई, कोई बड़प्पन की बात नहीं है। मेरे पास पैसे थे उस वक़्त इसलिए दे दिए। अच्छा दोस्त है तू तोह मना भी नहीं कर सकता था। तू भी मेरी जगह होता तोह ऐसा ही करता इसलिए चिल कर। 😊

(वैसे इस बारे में मैंने अपने दादा जी से कुछ टाइम पहले ही बात की थी। मैंने उनसे पूछा,”मैंने सही किया या नहीं?” उन्होंने बड़े ही सहज और शांत भाव में उत्तर दिया की, “तुमने सिर्फ 60 हज़ार ही नहीं दिए बल्कि दोस्ती की कीमत भी दे दी। दोस्ती की कीमत जिस ज़माने में तुम लोग जी रहे हो , उसकी वैल्यू साल दर साल वैसे भी कम हो रही है। सो अगर तुम्हारे मित्र की परिस्थिति ठीक हो गयी और उसको ये वैल्यू की समझ आ गयी तोह बिलकुल भी चिंता नहीं करनी। यदि उसे वैल्यू नहीं पता चली तोह वो पैसे और दोस्ती दोनों तुम्हारे नसीब में नहीं थे।)

उस फ़ोन कॉल के बाद उसने पैसे दे दिए पर उससे ज्यादा ख़ुशी मुझे मेरे दोस्ती की कीमत वापस मिलने की थी। 😄

4 thoughts on “दोस्ती की कीमत

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