एक छोटा भाई है हमारा गुड्डू , कॉलेज जाने के लिए एकदम तैयार। पर कोरोना के चक्कर में मुश्किल ही है की उसे कॉलेज जाना पड़े। कल थोड़ा आत्मा चिंतन के मूड में था वो, पूछा उसने की, “भईया कॉलेज ना जाने से जीवन में क्या मिस होने वाला है?” प्लास्टिक कुर्सी पर बैठे, अखभार पढ़ते हुए हम उसको स्पष्ट जवाब दिए की,” २ चीज़ों से वंचित रहोगे , एक हॉस्टल लाइफ और दूसरा मेस का खाना।” वो हस्स दिया और कटाक्ष भरे स्वर में बोला की, “मेस का खाना कौन मिस करता है? उसमे तोह स्वाद भी नहीं होता।”

हम अखबार फोल्ड किये और एक पैर को दूसरे पैर पर धर कर सुफीयाने अंदाज़ में उसको जवाब दिया की, “मेस के खाने के साथ जुड़ा होता है गज़ब संघर्ष। जो साल के पहले हफ्ते बहुत बढ़िया लगता है पर आने वाले दिनों में अपना स्वाद खो बैठता है। अगर गरम रोटी खानी हो तोह लाइन में लगना पड़ता है और अगर धैर्य ना हो तोह ठंडी रोटी व दाल-चावल से काम चलना पड़ता है। सुने ही होगे की समय बलवान होता है यदि समय पर मेस में पहुँच गए तोह सब्ज़ी की मात्रा ठीक मिल जायेगी और जो लेट हो गए तोह नामात्र ही रह जायेगी। दही भी मिलता है 2 चम्मच जितना, फिर वो चाहे पतला हो या खट्टा पीया जरूरर जाता है।”

हम गुड्डू को इशारा किये बगल वाली प्लास्टिक कुर्सी पर बैठने का और ध्यान देने को बोले की,” अब सुनो तर्रीका खाने को स्वादिस्ट बनाने का । मेस में 5rs का बटर बड़ा काम आता है। सादे चावल को फ्राइड चावल और बेस्वाद दाल को दाल-मखनी जैसा बना देता है।। हफ्ते में जो पनीर की सब्ज़ी के नाम पर टुकड़े मिलते है उससे तो 3-4 रोटी व ग्रेवी को चावल के साथ खा कर, भव्य भोज हो जाता है। मिठाई का कोटा फिक्स रहता है पर अगर मेस कर्मचारी के साथ व्यवहार अच्छा रखा तोह एक्स्ट्रा पीस मिलने का भी मौका रहता है। मिठाई ना भी हो तोह सौंफ और शक्कर है ही मुँह के स्वाद को बैलेंस करने के लिए।”

फोल्ड हुए पैर को नीचे रख कर , नम्रता पूर्वक हम गुड्डू की ओर देखे और समझाए की, “बाहर का खाना होता है लक्ज़री ,जो अनिवार्य होगा खुद के और अपने करीबी दोस्त के जनदिन पर ही। बाकी दिन मेस का खाना ही सत्य है और नसीब में है । अब तुमको लग रहा है की हम मेस के खाने का अनादर करते है। ऐसा बिलकुल नहीं है , हम भलीभाँति जानते है की हम लोग प्रिविलेज है जिन्हे खाना मिल तोह रहा है। हम तोह मेस के खाने की मिसाल दे रहे है , जिसके सहारे 4 बेहतरीन साल निकल जाते है। मेस के खाने को स्किप करना , उसको फेंकने से ज्यादा बेहतर ऑप्शन लगने लगता है। मेस के खाने से बॉडी भले ही ना बने पर 4 साल दुरस्त रखता है। मेस की टेबल पर लोगों के साथ व्यहार भी बनता है और अब घर के खाने की इज़्ज़त बढ़ती है दिल में सो अलग।

अखबार को वापस खोलते हुए और प्लास्टिक कुर्सी में वापस कम्फ़र्टेबल होकर हम गुड्डू को बोले, “मेरे भाई, मेस के खाने में तुमको स्वाद ना मिले पर सीख बहुत मिलेगी।”

2 thoughts on “मेस का खाना

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